मन कभी भी प्रज्ञावान नहीं हो सकता-केवल अ-मन प्रज्ञावान होता है। केवल अ-मन मौलिक और क्रांतिकारी हो सकता है। केवल अ-मन क्रान्तिकारी हो सकता है- क्रान्ति कृत्य में।
यह मन आपको एक प्रकार की जड़ता देता है। अतीत की स्मृतियों से बोझिल, भविष्य के प्रक्षेपण से बोझिल, तुम जीये चले जाते हो-न्यूनतम पर। तुम अधिकतम पर नहीं जीते। तुम्हारी ज्योति बहुत मंद रहती है।
जैसे ही तुम विचारों को गिराना प्रारंभ करते हो, धूल जो तुमने अतीत में इकट्ठी की है, तो ज्योति प्रबल हो उठती है, साफ, स्पष्ट, जीवंत, युवा। तुम्हारा संपूर्ण जीवन एक ज्योति बन जाता है, ज्योति, धूम्ररहित।। यही है सजगता।
यह मन आपको एक प्रकार की जड़ता देता है। अतीत की स्मृतियों से बोझिल, भविष्य के प्रक्षेपण से बोझिल, तुम जीये चले जाते हो-न्यूनतम पर। तुम अधिकतम पर नहीं जीते। तुम्हारी ज्योति बहुत मंद रहती है।
जैसे ही तुम विचारों को गिराना प्रारंभ करते हो, धूल जो तुमने अतीत में इकट्ठी की है, तो ज्योति प्रबल हो उठती है, साफ, स्पष्ट, जीवंत, युवा। तुम्हारा संपूर्ण जीवन एक ज्योति बन जाता है, ज्योति, धूम्ररहित।। यही है सजगता।
Osho ए सडन क्लैश ऑव थंडर अध्याय 1
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